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September 13, 2026

Sabarmati Samvad 2026: PM मोदी-पुतिन-शी जिनपिंग एक फ्रेम में क्यों? राम माधव जी ने समझाया पूरा समीकरण

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आज एक नई विश्व व्यवस्था आकार ले रही है, जिसे हम अंग्रेजी में ग्लोबल ऑर्डर कहते हैं। इस नई विश्व व्यवस्था में अनेक प्रकार के छोटे-छोटे मल्टीलेटरल और मिनीलेटरल संगठन बन रहे हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय संगठन ब्रिक्स (BRICS) है।

अहमदाबाद में आयोजित ‘साबरमती संवाद 2026’ में बदलती वैश्विक व्यवस्था, ब्रिक्स की बढ़ती भूमिका और ग्लोबल साउथ में भारत के प्रभाव को लेकर पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर जी और वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा जी ने भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रख्यात विचारक श्री राम माधव जी से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश –

प्रश्न: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, पुतिन और शी जिनपिंग एक ही फोटो फ्रेम में दिखाई दे रहे हैं। इस एक तस्वीर की बड़ी कहानी क्या है? इसके पीछे के समीकरण क्या हैं और यह तस्वीर दुनिया को क्या संदेश देती है?

उत्तर: आज एक नई विश्व व्यवस्था आकार ले रही है, जिसे हम अंग्रेजी में ग्लोबल ऑर्डर कहते हैं। इस नई विश्व व्यवस्था में अनेक प्रकार के छोटे-छोटे मल्टीलेटरल और मिनीलेटरल संगठन बन रहे हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय संगठन ब्रिक्स (BRICS) है। आज दुनिया तेजी से बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है। इस बदलती विश्व व्यवस्था में कई बहुपक्षीय और मिनीलेटरल समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इनमें यदि किसी बड़े और स्थायी समूह की बात करें, तो ब्रिक्स का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। आपने जिन तीन देशों का नाम लिया- भारत, रूस और चीन- वे ब्रिक्स के मूल संस्थापक देशों में शामिल हैं। लेकिन आज ब्रिक्स का दायरा इससे कहीं बड़ा हो चुका है। इसके अलावा कई अन्य देश भी इसके सदस्य और साझेदार के रूप में जुड़े हैं। जिस देश में ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित होता है, वहां दूसरे देशों को भी आमंत्रित किया जाता है। उदाहरण के लिए, भारत में आयोजित सम्मेलन के लिए भी बड़ी संख्या में देशों को आमंत्रित किया गया है।

इसलिए आज दुनिया में जो प्रमुख बहुपक्षीय समूह बने हैं, उनमें जी-20 के बाद ब्रिक्स का महत्व बहुत अधिक है। भारत स्वयं ब्रिक्स के संस्थापक सदस्यों में से एक है और वर्ष 2006 में इसकी स्थापना के समय से ही इसका हिस्सा रहा है। ब्रिक्स की शुरुआत BRIC के रूप में हुई थी- ब्राजील, रूस, भारत और चीन के समूह के रूप में। बाद में वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद यह BRICS बना। आज इसका विस्तार और भी व्यापक हो चुका है और इसे कई संदर्भों में BRICS Plus के रूप में देखा जाता है। ब्रिक्स के महत्व को समझने के लिए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। वैश्विक जीडीपी और वैश्विक व्यापार में भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए यह केवल कुछ देशों का समूह नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति-केंद्र के रूप में उभर रहा है। आज इस समूह में भारत की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। रूस, चीन और अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर ब्रिक्स एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की दिशा में काम कर रहा है, जिसमें दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों और देशों की आवाज को अधिक महत्व मिले।

प्रश्न: ब्रिक्स को अक्सर ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में देखा जाता है। कूटनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से इस आवाज में कितना दम है?

उत्तर: यदि आप हाल ही में जारी दिल्ली घोषणा-पत्र को पढ़ेंगे, तो उसमें बार-बार ग्लोबल साउथ का उल्लेख मिलता है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ग्लोबल साउथ कोई भौगोलिक विभाजन नहीं है। पहले जिस शब्द का इस्तेमाल किया जाता था, वह था डेवलपिंग वर्ल्ड, यानी विकासशील दुनिया। मोटे तौर पर यूरोप और अमेरिका से अलग दुनिया के बड़े हिस्से को आज ग्लोबल साउथ कहा जाता है। यह बहुत बड़ा भूभाग है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है।

दुनिया में एक दूसरा महत्वपूर्ण समूह जी-7 है। जी-7 मुख्य रूप से पश्चिमी देशों का समूह है। वैश्विक आबादी के लिहाज से जी-7 का हिस्सा सीमित है, लेकिन वैश्विक जीडीपी में इन देशों की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है। इसके विपरीत, ब्रिक्स की विशेषता यह है कि इसमें पश्चिमी दुनिया का कोई देश शामिल नहीं है। ब्रिक्स में न तो कोई यूरोपीय देश है और न ही अमेरिका। इसके सदस्य मुख्य रूप से उस दुनिया का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पश्चिमी देशों के बाहर है और जिसकी आर्थिक तथा रणनीतिक ताकत तेजी से बढ़ रही है। अगर आप आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था को देखें, तो दुनिया की आर्थिक वृद्धि का बड़ा हिस्सा इन्हीं उभरती अर्थव्यवस्थाओं से आ रहा है। भारत आज तेज गति से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है। इंडोनेशिया और चीन भी महत्वपूर्ण गति से आगे बढ़ रहे हैं। इसके विपरीत, यूरोप की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में विकास की गति अपेक्षाकृत काफी धीमी है।

इसलिए हम कह सकते हैं कि ग्लोबल साउथ आज विश्व की आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण इंजन बन चुका है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मौजूदा वैश्विक संस्थाओं में ग्लोबल साउथ को उसकी वास्तविक आर्थिक और जनसंख्या संबंधी ताकत के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्था में भी ग्लोबल साउथ की आवाज अपेक्षाकृत कमजोर है। सुरक्षा परिषद में रूस और चीन जैसे देश मौजूद हैं, लेकिन व्यापक संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में पश्चिमी शक्तियों का प्रभाव अब भी काफी अधिक है। ऐसे में ब्रिक्स की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। ब्रिक्स ग्लोबल साउथ को एक साझा मंच और उसकी आवाज को अधिक प्रभावी ढंग से सामने रखने का अवसर देता है। यही कारण है कि बदलती हुई विश्व व्यवस्था में ब्रिक्स का महत्व लगातार बढ़ रहा है। यह केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति, कूटनीति और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रहा है।

Published by Ram Madhav

Member, Board of Governors, India Foundation

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